कौन है अपना , कौन है पराया ,
वक़्त ने ऐसा फेर लगाया।
इंसान ने खुद ही खुद को ,
सृष्टि का भगवान, जो माना।
बाँट दिया है , काट दिया है ,
मानवता को तार तार किया है।
ऊपर निचे ,दाये बाये ,
आगे पीछे ,सभी दिशायें।
राजनीती के रंग महल से ,
हे इंसान,
क्यों ऐसा ,कुठारघात किया है।
उल्टा पुल्टा , रंग बिरंगी ,
सतरंगी इंद्रधनुष में।
क्यों , हे इंसान,
विकृति , विभित्स विचार का,
महिमांडित उद्गार किया है।
जात - पात , ऊंच नीच।
धर्म अधर्म के कुचक्र में।
हम सबने तो खुद ही खुद से।
रिश्तो को मंझधार में लाया।परिपाटी को धूल चटाया।
समय ये ऐसा , आया है
हमने तुमने , सबने मिलकर।
आज ,
काला धन का सम्मान किया है ,
सज्जनता को बदनाम किया है ।
मैंने , तुमने ,हम , सबने,
जन जन को है बोध कराया ,
मिथ्या , माया, धन की छाया ,
ही ,जीवन का अमिट सत्य है।
पिकाचु
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