Sunday, November 27, 2016

जन जन को है बोध कराया


कौन है अपना , कौन है पराया ,
वक़्त ने  ऐसा फेर लगाया।

इंसान ने खुद ही खुद को ,
सृष्टि का भगवान, जो माना।
बाँट दिया है , काट दिया है ,
मानवता को तार तार किया है।

ऊपर निचे ,दाये बाये ,
आगे पीछे ,सभी दिशायें।
राजनीती  के  रंग महल से ,
हे  इंसान,
क्यों ऐसा ,कुठारघात किया है।

उल्टा पुल्टा , रंग बिरंगी ,
सतरंगी इंद्रधनुष  में।
क्यों , हे  इंसान,
विकृति , विभित्स विचार का,
महिमांडित उद्गार किया है।

जात - पात , ऊंच नीच।
धर्म अधर्म  के कुचक्र में। 
हम सबने तो खुद ही खुद से। 
रिश्तो को मंझधार में लाया।
परिपाटी को धूल चटाया।

समय ये ऐसा , आया है
हमने तुमने , सबने मिलकर।
आज ,
काला धन का  सम्मान किया है  ,
सज्जनता को बदनाम किया है ।

मैंने , तुमने ,हम , सबने,
जन जन को है  बोध कराया ,
मिथ्या , माया, धन की छाया ,
ही ,जीवन का अमिट सत्य है।

पिकाचु
https://complaintcare.blogspot.in/

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