Thursday, January 26, 2017

हुस्न


हुस्न की चाह ,
छुपाये नहीं छुपता।

दिल लगाया है हुस्न से ,
धड़कनो को थमने,
का एहसास  नहीं होता ।

दिल तो मानता नही , चंद लम्हे ही चाहता है ,
हुस्न की ,
पर हुस्न है कि ,
मानता ही नहीं।

हसीना का हुस्न क्या ,
आशिक़ की आशिक़ी ,
दीवाना का दीवानापन।
और क्या ?
एक लाईलाज रोग।

खड़ा था हुस्न के चौराहे पे,
ले  रहा था ,
गुजरे हुए हुस्न का  एहसास।
लगा था रेला हुस्न का ,
चाट , गुपचुप के रेले पे।

हुस्न अब बस एहसासों  के,
हम साये में ही रह गया है।
हुस्न अब , गुपचुप,
चुप चुप खाकर ,
भई गुब्बारा हो गया ।

वक्त के एहसासों में
हुस्न हुस्न करता फिर रहा  हु ,
बुढौती है,
फिर भी हुस्न को तलाशता फिर रहा हु।

पिकाचु



ये क्या हो रहा है

ये क्या हो रहा है।
मन कुछ ठहर सा ,
सहम सा ,
क्यों हो  गया है।

गम क्या, ख़ुशी क्या ,
जीत क्या, हार क्या।
जज्बात क्यों ,
ठिठक से गये है।

ये क्या हो रहा है,
ये क्यों हो रहा है ,
अंदर ही अंदर ,
अपना जीवन,
क्यों , उलझ के
सुलग  सा गया  है ।

जीवन का अभ्यास ,
तनिक भी रफीक न रहा।
इंसान अपना मगरूर,
संगदिल,मशगूल
आवारा , काफिर   ,
क्यों हुए जा रहा है।

ये क्या हो रहा है।
अबूझ पहेली,
क्यों,
जीवन हम सब का ,
रफ्ता रफ्ता हुए जा रहा है ।

पिकाचु 

Wednesday, January 25, 2017

धमाचौकोडी

इधर उधर की धमाचौकोडी
नाच नचाये बच्चो की चौकड़ी।

चिलम चाली , अकडम ,पकड़म ,
धूम धड़ाका ,
गूंज रहा है आवाजो से ,
नन्हे मुन्ने , राज दुलारो का,
ये गुलिस्ता।

एक पल की इनकी लड़ाई ,
दूजे  पल है प्रीत निभाई।
खेल बड़ा ये निराला है ,
प्यार तो इनकी पाठशाला ।

छुप्पा -छुप्पी, , छुक  छुक गाड़ी ,
लप्पड़ थप्पड़ , अकड़म पकड़म।
फिक्र नहीं  है जीत हार की।
पक्के है , सतरंगी है ,
रमे  है अपनी धुन में ये ,सच्चे। .





पिकाचु 

Tuesday, January 24, 2017

मैं अजनबी हु ,


मैं अजनबी हु ,
तटस्थो के मरुस्थल में खोजता ,
अपनी जमी।
मैं वो अजनबी हु।

मैं  बवंडर  हु ,
हवाओ के वेगो को थामे हुए ,
निरंतर खड़ा।
दबाव के समुन्दर को छितराते हुए ,
जीवन को समर्पित।
मैं  बवंडर हु।

मैं पथिक हु ,
न सफर का पता  ,
न रास्ते का पता ,
न मंजिल की उम्मीद ,
बस चले जा रहा हु।
मैं  पथिक हु।

मैं भूख हु ,
मेरी क्षुधा में सिर्फ मैं।
मैं भूख हु।

पिकाचु 

Monday, January 23, 2017

तुम, ठीक व्यक्ति नहीं

लो एक और कहकशा  ,
लो एक और दुआ ,
लो एक और बददुआ ,
सुना के कोई,
अभी अभी, ही गया।

स्तब्ध, नि:शब्द,
लड़खड़ा, संयम हो।
मैं ढूंढने चल पड़ा,
फिर एक नई बददुआ।

आहिस्ता-आहिस्ता,
एकनिष्ठ हो, निपुण मैं ,
झेलने में , ये  बददुआ।

वो आज फिर आई ,
बोला तुम, ठीक व्यक्ति नहीं।
फर्क नहीं पड़ता तुम्हे।
गुरेज ही नहीं ,
क्यों ? कोई अभिव्यक्ति नहीं।

हँस पड़ा खिलखिलाकर मैं।
कोई शिकन नहीं।
लगे कौन सी बददुआ ।
यहाँ तो रुके , खड़े है अरसो से।
क्रमबद्ध कतार  में ,ये बददुआ ।

पिकाचु


मैं कैसा

एक समाज है ,
वाणी विराम पे ,
सोच  निःशब्द ,
प्रवृत्ति जड़ता ,
गति  शून्य ,
शरीर  पक्षघात।
ये हमारा  समाज  है।

लोग कैसे ,
एक पल गर्म ,
दूजे पल  नरम ,
पलके बोझिल ,
धड़कन  डब डब ,
रिश्ते  सुखाड़ ,
आषाढ़ विपदा ,
निरुत्तर मन ,
ये हम लोग है।

मैं कैसा ,
अँधेरा पूनम का ,
रौशनी अमावस्या की ,
ईष्या खुद से ,
निकाला जमात से ,
कर्म निम्न।
कोढ़ मन का।
मैं हु ऐसा।

लिखे तो क्या लिखे ,
निरुत्तर मन,कुछ न लिखे।

पिकाचु

Sunday, January 22, 2017

दिल का आंगन खुला है मेरा:-

घर आंगन खुला है मेरा ,
इन्तेजार है ,  तेरा दशको से,
पल दो पल का ,पतझर छोड़,
प्यार का कोपल, आने दे।

मन मेरा ढूंढ रहा है ,
फिजा में फूलो की, भीनी भीनी  खुशबु।
खुले  आंगन में खोज रहा हु  ,
खोया अपना संसार जहाँ।

घर आंगन खुला है मेरा ,
रुके वक्त को  दौड़ लगाने ।
रुके रहोगी,  तुम कब तक निर्मोही ,
समय का  लेखा-जोखा, ठहरा मेरा।

बाट जोह रहा, और भी कोई ,
दिल का आंगन खुला कर अपना।
अपराध  तो  तेरा अछम्य है।
दुआ है उसका, छोड़ दिया।

घर आंगन  खोलो अपना ,
हवा का झोंका आने दो।
जीवन का बसंत जो बिता ,
लेख जोखा, बचा है ,अभी अश्को का।
पतझर जाये ,
खुले आंगन में वसन्त तो आने दो।

पिकाचु




टूट गया है

सपना अपना इस  जीवन का ,
टूट गया है। 

पूंजी अपनी इस संगत का  ,
बिखर  गया है। 

राही रास्ता , इस मंजिल  का ,
खो  गया है। 

दर्द है इतना , इसको सहते  ,
टूट  गया हु। 

किदन्ती इतनी , इस व्यथा की  ,
संकलन करना, छोड़ दिया है । 

कैसे बताऊ ,
मौला अपना, इस  अनुयायी को ,
इस मंझधार में,
क्यों  भूल  गया है। 

पिकाचु 

Saturday, January 21, 2017

चर्बी बढ़ता , थुलथुल देश

चर्बी बढ़ता , थुलथुल देश ,
आहार का बदला ,ऐसा  परिवेश।
भोजन सूची ,सुबह है पास्ता ,
दोपहर पिज़्ज़ा , शाम को बर्गर।

बोतल , डब्बा , थैली ,पैकेट ,
संसाधित खाना, का मौजूद जमाना।

दाल भात , रोटी सब्जी ,
पुआ पूड़ी,लिटि चोखा।
समय से पहले ,पच कर  गायब।

सब्जी रोती  एक किनारे,
रंग हरा से हो गया पीला।
हँसता अपना आलू भैया ,
मांग तो इसकी बनी है, अभी तक।

कलयुग की है, कैसी ब्यार ,
हाँथ  किसे  है ,आज हिलाना ,
खाना किसको, आज बनाना।
अधिकारों का है  पिंग  बढ़ाया ,
पाकशाला  की चिता सजाई,
उलझे जिसमे भैया-भौजी, सास- लुगाई।

पिकाचु 

वक्त के हाथो में

दे दो अपने ,वक्त को,
वक्त के हाथो में।

पल पल का हिसाब ,
रहने दो ,
वक्त के हाथो में।

रेतो में, यादो की तस्वीरो,
उकेरना,छोड़ दो,
वक्त के हाथो में।

हवाओ के बवंडर में ,
रेतो को लड़ने,
छोड़ दो,
वक्त की हाथो में।

वक्त से खेला था, हमने कभी ,
वक्त ही खेल रहा है ,
तब से अभी।


वक्त था, ये  भ्रम था,
की मैं हु ,
वक्त है कि , पूछता फिर रहा ,
मैं क्यों हूँ।

वक्त है , संभल जा ,
वक्त सा पिघल जा ,
वक्त सा अमर बन ,
एक इंसान तो बन जा।

पिकाचु








Friday, January 20, 2017

अंदाज ए बयां , वक्त का :

अंदाज ए बयां , वक्त का  ,
शाज , शहनाई , श्रृंगार  कर,
छठा-घटा में ,कर्म की साधना की ,
ज्योति,
अंदाज ए बयां , वक्त के साथ जलायेगा।

विस्मित है वो , मदहोश है वो ,
प्रीत के ब्यार के नव बौछार  से।
पल ये अगला , रीत क्या लायगा।

धड़कते  दिल की, धधकते अग्न से ,
श्रुति मीत का , संगीत प्रणय का ,
मन आंगन में,यौवन  की कोपल,
अंदाज ए बयां , वक्त के साथ खिलायेगा।

भँवरे कली की.संयोग की बेला ,
मन ये बावला , तन ये कम्पन।

मित  प्रीत के सम्भोग के उद्धव से ,
सृष्टि में अब फिर कोई,  नव ब्यार,
प्रेम का ,
अंदाज ए बयां , वक्त के साथ   बहायेगा।

पिकाचु 

Thursday, January 19, 2017

ये कौन सी बात है

ये कौन सी बात है,
दौड़ पड़ी वो ,छोटी सी लड़की  ,
हरी बत्ती से लाल होते।
गति तेज , लगे जैसे ,
करंट का झटका ,
गाड़ी चलती , लड़की दौड़ती ,
पहुँच चुकी वो बत्ती पर, फिर।

भीख मांगना, बुरी बात है ,
दूर बैठे रुकी, चलती, गाड़ी में ,
चुपचाप,ये देखना,
अच्छी बात है!
अपना देश , अपना माट्टी ,
कैसे भ्रष्ट हुये विचार ,
ये कौन सी बात है।
ये कैसा विकास है।

चर्चा, परिचर्चा ,
कभी खाट पे ,
कभी चाय पे ,
कितने बार , दौड़ लगाये ,
लाल और हरे के खेल में ,
कब तक लड़की, यु  बौराये।
ये कौन सी बात है ,
ये कैसा विकास है।

वक्त से लड़ाई , सब लड़ते है ,
कुछ ठहरते , कुछ सुस्ताते , फिर लड़ते है।
पल पल की वो,
लाल हरे की,
बत्ती की ये,
लड़की से लड़ाई ,
ये कौन सी बात है ,
ये कैसा विकास है।

पिकाचु

जीना ये आसान नहीं है

जी नहीं है , जान  नहीं है ,
जीने की अरमान नहीं है।
रफ्ता , रफ्ता , वक्त ,
जो चलता ,
जीना ये आसान नहीं है।


जीतेजी जो हार गये ,
जज्बात अपने जो गये ,
जज्बे तो सारे, सो गये ,
जलने को , तन्हा ,
जो  छोड़ गये।
जीने की अरमान नहीं है,
जीना ये आसान नहीं है।

जाने क्यों इस रूह में ,
जाने का भी कोई गम नहीं।
जालिम जो  तेरे जेर से,
जाते हुए भी दूर से ,
जमते हुए अश्को से मैं ,
जा रहा हु, रफ्ता , रफ्ता ।
जीना ये आसान नहीं है।

जिन्दा हु बस, जान नहीं है ,
जन्नत की आजार नहीं ,
जख्म तेरे, मेरे है जेबा
जीनत जुदा तो  जिस्म क्या ,
जायज नहीं अब ये वक्त जो
जीना ये आसान नहीं है।


पिकाचु( कॉपीराइट शोभा सचिन्द्र: १९०१२०१७  )






Wednesday, January 18, 2017

अविश्वाशो के मकड़ जाल

दो चिड़ियों की ऊँची उड़ान ,
सुबह सवेरे ,देख रहा ,
रुका  हुआ ,
मैं एक  इंसान।

मेरा घर , मेरा सम्पति ,
मेरा बेटा  , मेरा बेटी ,
इस मिथ्या के भ्रम जाल ने ,
बांध के रखा ,
मेरी उड़ान।

मेरा क्या , सम्पति !
वर्ग फुट ,बीघा  एकड़ ,
ये तो सीमित है।
फिर क्यों  भाग रहे है ?,
इनके पीछे।
दरकार है जब, कुछ गज की ही।

उड़ने की अभिलाषा   , नभ छूने की जिज्ञासा ,
मूल पाठ है, इस जीवन पथ का।
गिरकर उठना , उठकर गिरना ,
गती है ये,  दिन- रात   जैसी।

कर्म ज्ञान का , कर्तव्य त्याग का ,
भाव है जब ग्रंथो का।
क्यों मानव की  उड़ने की अभिलाषा ,
कालचक्र ने लील  लिया है।

देखो विश्वास है कितना,
इन चिडयों का ,
उस  ठूठे पेड की घोसले पे।
छोड़ के, अपने  चीची करते बच्चो को ,
भ्रम जाल से ,निकल पड़े है।
मैं , तुम , हम क्यों फिर  ,
अनुरागी बन,
उलझ रहे है , अविश्वाशो के मकड़ जाल  में।

पिकाचु








Tuesday, January 17, 2017

लटकम , झटकम , दही का मट्ठा

लटकम , झटकम ,
दही का मट्ठा ,
गुपचुप , चप चप  ,
दही का भल्ला ,
चाट पापड़ी , कुरकुरे समोसा ,
जीभ चटकाते , खाते झटपट।

छोटा , छोटी , मोटा , मोटी ,
दीदी, भैया , पापा , मम्मी,
पलटन लेकर खड़े है, सब।
गिनती अपना कब आएगा।
इन्तेजार में अपनी ,
कही,
चाट पापड़ी , खत्म न हो जाये।

लार टपकाते कब तक बैठे ,
इन्हें  चबाने कब दोगे भैया।
कब तक रोके अपनी जिह्वा ,
लटकम झटकम , चिल्ला  रहे भैया।

चाट, पकौड़ी , गुपचुप , पापड़ी ,
जल्दी जल्दी खाने दो।
नशा तो अपना  खाना है ,
खाकरा , थेपला ,ढोकला ,
अभी तो बाकी ,
लटकम झटकम दही का मट्ठा।

पिकाचु 

भोली भाली मनमौजी

भोली भाली  मनमौजी ,
पिया संग खेले,  हमजोली।

संग संग पिया  संग  ,
बिखरे सतरंगी रंग।
उड़े मनवा भोली भाली  के ,
बसंती हवा संग।

खन खन ,  मन - मन ,
टुकुर टुकुर चुपचाप देखे,
पिया हो।
भोली भाली के बहते कदम।

टुकुर टुकुर, दीवाने जैसे ,
पिया ,
तुम क्यों हो गए ऐसे।

भोली भाली मनमौजी संग ,
पिया  हो गए है  बावले।
मुँहवा  में निवाला डाले ,
धीरे धीरे भोली भाली।

ऐसें ही मौसम रहे ,
भोले भाली पिया संग रहे।
चाहे, ये दुनिया,
ऐ भैया  ,
सबके ऐसे ही हमजोली मिले।
भोली भाली संग पिया के ,
ई कहानी, हमेशा ही  अमर रहे।

पिकाचु

एक लड़की थी-एक लड़का था

एक लड़की थी ,
कहती थी , वो ,
मैं सुंदर हु।

एक लड़का था ,
अँधेरे में देखता था।
कैसे कहे,  वो ,
तुम सुंदर हो।

उस लड़की के पास,
वो, लड़का गया।
पूछा, कौन हो तुम।
बोली , मैं सुंदर  हु।
कौन तुम ?.
हाँ मैं ?.

भोलापन , अल्हड़पन ,
में भींगा ,
कोमल सा ,वचन।
छु गया ,
उस लड़के का मन।
बोला,
हाँ , तुम  सुंदर हो।

सच है ,
मन की आँखे,
पास जिसके , वो सुंदर है।

पिकाचु 












Monday, January 16, 2017

अमिता का अमिताभ

चढ़ती खुमार ,
है ये, प्यार  का बुखार ,
भूलते है यार ,
रब की दरकार,
बस चाहे तेरा प्यार , ओ मेरे यार।

कितने ही किस्से हो ,
कितने अफ़साने हो,
हम तो बेगाने हो ,
प्यार के दीवाने हो ,
बस चाहे तेरा प्यार , ओ मेरे यार।

ढलता नहीं है तेरा नशा ,
चढ़ता है, ये अंगूरी नशा,
जितने पुराने होये ,
बस चाहे तेरा प्यार , ओ मेरे यार।


कौमुदी का कौमार्य हो  ,
अमिता का अमिताभ हो  ,
मिश्री सा सहचर बन ,
सागर सा असीम बन ,
चाहता हु ,
सिर्फ तुम्हें  मैं। ओ मेरे यार।


पिकाचु 

Saturday, January 14, 2017

अटकन , भटकन , इन्हें उड़ाए



चलो कुछ हवा बनाये ,
अटकन , भटकन , इन्हें उड़ाए।

कुछ बाते करते आज ,
काफी , चाय , ठंडी ,  ठंडई , सुरासर  की।

उठक बैठक , ताल ठोक कर ,
जोर का धक्का  या ठेलम कर ,
गड्डी तो स्टार्ट कर  भईया।
कब तक बैटरी गिरा  रहेगा ,
पंजा ,  त्वरक,स्टार्टर गुमा रहेगा ,
चलो कुछ हवा बनाये ,
अटकन , भटकन , इन्हें उड़ाए।

नट बोल्ट टाइट कर  ,
छेनी , हथौड़ा , कील ठोक  दे बाबु ,
आज तो अपनी गड्डी दौड़ेगी,
गतिरोधक भी  उड़ा  देगी।
अटकन , भटकन भूल कर ,
ओ बालक  ,
चलो कुछ हवा बनाये ,
अपनी गड्डी हवे में उड़ाए।

पिकाचु




Friday, January 13, 2017

आईना देखा , मन का


आईना देखा , मन का ,
तन की रंग से  मैला था।
दन्त विषैला, जिव्हा लपलप ,
लार टपकते लालच के ,
चक्छु थे  वासना की भूखे।
मैंने पूछा ,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।


उदर पीत से विष का पाचन ,
ह्रदय - धमनियों में ,
प्रवाह तरल गरल का ,
फेफड़ा सिकुडा , गुर्दा मुर्दा ,
आंत निष्चेश्ट , लहू है  ठोस,
मैंने पूछा ,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।

कर्म है मेरा ,
खुदगर्जी , मनमर्जी का।
पदचाप  अहम से,
हिलोरे मारे।
बंद मुठी है ,
भुजा भुजंग बन।
ठोकर मारे ,
धीर विचार को।
आवाज , आगाज में,
लहू का सैलाब ।
मैंने पूछा ,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।


क्रोध, वासना  का
कर्तव्य प्रतिमान है  ।
स्वजन पक्षपात का ,
प्रचार प्रसार है।
होड़ में तेरे मिथ्या , स्वार्थ है।
फिर क्यों पुछे,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।

पिकाचु