Saturday, January 21, 2017

वक्त के हाथो में

दे दो अपने ,वक्त को,
वक्त के हाथो में।

पल पल का हिसाब ,
रहने दो ,
वक्त के हाथो में।

रेतो में, यादो की तस्वीरो,
उकेरना,छोड़ दो,
वक्त के हाथो में।

हवाओ के बवंडर में ,
रेतो को लड़ने,
छोड़ दो,
वक्त की हाथो में।

वक्त से खेला था, हमने कभी ,
वक्त ही खेल रहा है ,
तब से अभी।


वक्त था, ये  भ्रम था,
की मैं हु ,
वक्त है कि , पूछता फिर रहा ,
मैं क्यों हूँ।

वक्त है , संभल जा ,
वक्त सा पिघल जा ,
वक्त सा अमर बन ,
एक इंसान तो बन जा।

पिकाचु








Friday, January 20, 2017

अंदाज ए बयां , वक्त का :

अंदाज ए बयां , वक्त का  ,
शाज , शहनाई , श्रृंगार  कर,
छठा-घटा में ,कर्म की साधना की ,
ज्योति,
अंदाज ए बयां , वक्त के साथ जलायेगा।

विस्मित है वो , मदहोश है वो ,
प्रीत के ब्यार के नव बौछार  से।
पल ये अगला , रीत क्या लायगा।

धड़कते  दिल की, धधकते अग्न से ,
श्रुति मीत का , संगीत प्रणय का ,
मन आंगन में,यौवन  की कोपल,
अंदाज ए बयां , वक्त के साथ खिलायेगा।

भँवरे कली की.संयोग की बेला ,
मन ये बावला , तन ये कम्पन।

मित  प्रीत के सम्भोग के उद्धव से ,
सृष्टि में अब फिर कोई,  नव ब्यार,
प्रेम का ,
अंदाज ए बयां , वक्त के साथ   बहायेगा।

पिकाचु 

Thursday, January 19, 2017

ये कौन सी बात है

ये कौन सी बात है,
दौड़ पड़ी वो ,छोटी सी लड़की  ,
हरी बत्ती से लाल होते।
गति तेज , लगे जैसे ,
करंट का झटका ,
गाड़ी चलती , लड़की दौड़ती ,
पहुँच चुकी वो बत्ती पर, फिर।

भीख मांगना, बुरी बात है ,
दूर बैठे रुकी, चलती, गाड़ी में ,
चुपचाप,ये देखना,
अच्छी बात है!
अपना देश , अपना माट्टी ,
कैसे भ्रष्ट हुये विचार ,
ये कौन सी बात है।
ये कैसा विकास है।

चर्चा, परिचर्चा ,
कभी खाट पे ,
कभी चाय पे ,
कितने बार , दौड़ लगाये ,
लाल और हरे के खेल में ,
कब तक लड़की, यु  बौराये।
ये कौन सी बात है ,
ये कैसा विकास है।

वक्त से लड़ाई , सब लड़ते है ,
कुछ ठहरते , कुछ सुस्ताते , फिर लड़ते है।
पल पल की वो,
लाल हरे की,
बत्ती की ये,
लड़की से लड़ाई ,
ये कौन सी बात है ,
ये कैसा विकास है।

पिकाचु

जीना ये आसान नहीं है

जी नहीं है , जान  नहीं है ,
जीने की अरमान नहीं है।
रफ्ता , रफ्ता , वक्त ,
जो चलता ,
जीना ये आसान नहीं है।


जीतेजी जो हार गये ,
जज्बात अपने जो गये ,
जज्बे तो सारे, सो गये ,
जलने को , तन्हा ,
जो  छोड़ गये।
जीने की अरमान नहीं है,
जीना ये आसान नहीं है।

जाने क्यों इस रूह में ,
जाने का भी कोई गम नहीं।
जालिम जो  तेरे जेर से,
जाते हुए भी दूर से ,
जमते हुए अश्को से मैं ,
जा रहा हु, रफ्ता , रफ्ता ।
जीना ये आसान नहीं है।

जिन्दा हु बस, जान नहीं है ,
जन्नत की आजार नहीं ,
जख्म तेरे, मेरे है जेबा
जीनत जुदा तो  जिस्म क्या ,
जायज नहीं अब ये वक्त जो
जीना ये आसान नहीं है।


पिकाचु( कॉपीराइट शोभा सचिन्द्र: १९०१२०१७  )






Wednesday, January 18, 2017

अविश्वाशो के मकड़ जाल

दो चिड़ियों की ऊँची उड़ान ,
सुबह सवेरे ,देख रहा ,
रुका  हुआ ,
मैं एक  इंसान।

मेरा घर , मेरा सम्पति ,
मेरा बेटा  , मेरा बेटी ,
इस मिथ्या के भ्रम जाल ने ,
बांध के रखा ,
मेरी उड़ान।

मेरा क्या , सम्पति !
वर्ग फुट ,बीघा  एकड़ ,
ये तो सीमित है।
फिर क्यों  भाग रहे है ?,
इनके पीछे।
दरकार है जब, कुछ गज की ही।

उड़ने की अभिलाषा   , नभ छूने की जिज्ञासा ,
मूल पाठ है, इस जीवन पथ का।
गिरकर उठना , उठकर गिरना ,
गती है ये,  दिन- रात   जैसी।

कर्म ज्ञान का , कर्तव्य त्याग का ,
भाव है जब ग्रंथो का।
क्यों मानव की  उड़ने की अभिलाषा ,
कालचक्र ने लील  लिया है।

देखो विश्वास है कितना,
इन चिडयों का ,
उस  ठूठे पेड की घोसले पे।
छोड़ के, अपने  चीची करते बच्चो को ,
भ्रम जाल से ,निकल पड़े है।
मैं , तुम , हम क्यों फिर  ,
अनुरागी बन,
उलझ रहे है , अविश्वाशो के मकड़ जाल  में।

पिकाचु








Tuesday, January 17, 2017

लटकम , झटकम , दही का मट्ठा

लटकम , झटकम ,
दही का मट्ठा ,
गुपचुप , चप चप  ,
दही का भल्ला ,
चाट पापड़ी , कुरकुरे समोसा ,
जीभ चटकाते , खाते झटपट।

छोटा , छोटी , मोटा , मोटी ,
दीदी, भैया , पापा , मम्मी,
पलटन लेकर खड़े है, सब।
गिनती अपना कब आएगा।
इन्तेजार में अपनी ,
कही,
चाट पापड़ी , खत्म न हो जाये।

लार टपकाते कब तक बैठे ,
इन्हें  चबाने कब दोगे भैया।
कब तक रोके अपनी जिह्वा ,
लटकम झटकम , चिल्ला  रहे भैया।

चाट, पकौड़ी , गुपचुप , पापड़ी ,
जल्दी जल्दी खाने दो।
नशा तो अपना  खाना है ,
खाकरा , थेपला ,ढोकला ,
अभी तो बाकी ,
लटकम झटकम दही का मट्ठा।

पिकाचु 

भोली भाली मनमौजी

भोली भाली  मनमौजी ,
पिया संग खेले,  हमजोली।

संग संग पिया  संग  ,
बिखरे सतरंगी रंग।
उड़े मनवा भोली भाली  के ,
बसंती हवा संग।

खन खन ,  मन - मन ,
टुकुर टुकुर चुपचाप देखे,
पिया हो।
भोली भाली के बहते कदम।

टुकुर टुकुर, दीवाने जैसे ,
पिया ,
तुम क्यों हो गए ऐसे।

भोली भाली मनमौजी संग ,
पिया  हो गए है  बावले।
मुँहवा  में निवाला डाले ,
धीरे धीरे भोली भाली।

ऐसें ही मौसम रहे ,
भोले भाली पिया संग रहे।
चाहे, ये दुनिया,
ऐ भैया  ,
सबके ऐसे ही हमजोली मिले।
भोली भाली संग पिया के ,
ई कहानी, हमेशा ही  अमर रहे।

पिकाचु

एक लड़की थी-एक लड़का था

एक लड़की थी ,
कहती थी , वो ,
मैं सुंदर हु।

एक लड़का था ,
अँधेरे में देखता था।
कैसे कहे,  वो ,
तुम सुंदर हो।

उस लड़की के पास,
वो, लड़का गया।
पूछा, कौन हो तुम।
बोली , मैं सुंदर  हु।
कौन तुम ?.
हाँ मैं ?.

भोलापन , अल्हड़पन ,
में भींगा ,
कोमल सा ,वचन।
छु गया ,
उस लड़के का मन।
बोला,
हाँ , तुम  सुंदर हो।

सच है ,
मन की आँखे,
पास जिसके , वो सुंदर है।

पिकाचु 












Monday, January 16, 2017

अमिता का अमिताभ

चढ़ती खुमार ,
है ये, प्यार  का बुखार ,
भूलते है यार ,
रब की दरकार,
बस चाहे तेरा प्यार , ओ मेरे यार।

कितने ही किस्से हो ,
कितने अफ़साने हो,
हम तो बेगाने हो ,
प्यार के दीवाने हो ,
बस चाहे तेरा प्यार , ओ मेरे यार।

ढलता नहीं है तेरा नशा ,
चढ़ता है, ये अंगूरी नशा,
जितने पुराने होये ,
बस चाहे तेरा प्यार , ओ मेरे यार।


कौमुदी का कौमार्य हो  ,
अमिता का अमिताभ हो  ,
मिश्री सा सहचर बन ,
सागर सा असीम बन ,
चाहता हु ,
सिर्फ तुम्हें  मैं। ओ मेरे यार।


पिकाचु 

Saturday, January 14, 2017

अटकन , भटकन , इन्हें उड़ाए



चलो कुछ हवा बनाये ,
अटकन , भटकन , इन्हें उड़ाए।

कुछ बाते करते आज ,
काफी , चाय , ठंडी ,  ठंडई , सुरासर  की।

उठक बैठक , ताल ठोक कर ,
जोर का धक्का  या ठेलम कर ,
गड्डी तो स्टार्ट कर  भईया।
कब तक बैटरी गिरा  रहेगा ,
पंजा ,  त्वरक,स्टार्टर गुमा रहेगा ,
चलो कुछ हवा बनाये ,
अटकन , भटकन , इन्हें उड़ाए।

नट बोल्ट टाइट कर  ,
छेनी , हथौड़ा , कील ठोक  दे बाबु ,
आज तो अपनी गड्डी दौड़ेगी,
गतिरोधक भी  उड़ा  देगी।
अटकन , भटकन भूल कर ,
ओ बालक  ,
चलो कुछ हवा बनाये ,
अपनी गड्डी हवे में उड़ाए।

पिकाचु




Friday, January 13, 2017

आईना देखा , मन का


आईना देखा , मन का ,
तन की रंग से  मैला था।
दन्त विषैला, जिव्हा लपलप ,
लार टपकते लालच के ,
चक्छु थे  वासना की भूखे।
मैंने पूछा ,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।


उदर पीत से विष का पाचन ,
ह्रदय - धमनियों में ,
प्रवाह तरल गरल का ,
फेफड़ा सिकुडा , गुर्दा मुर्दा ,
आंत निष्चेश्ट , लहू है  ठोस,
मैंने पूछा ,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।

कर्म है मेरा ,
खुदगर्जी , मनमर्जी का।
पदचाप  अहम से,
हिलोरे मारे।
बंद मुठी है ,
भुजा भुजंग बन।
ठोकर मारे ,
धीर विचार को।
आवाज , आगाज में,
लहू का सैलाब ।
मैंने पूछा ,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।


क्रोध, वासना  का
कर्तव्य प्रतिमान है  ।
स्वजन पक्षपात का ,
प्रचार प्रसार है।
होड़ में तेरे मिथ्या , स्वार्थ है।
फिर क्यों पुछे,
मेरा तन- मन क्यों ऐसा।

पिकाचु



कटी पतंग


कटी रे कटी , 
चिल्लाये सारे,
नजर घुमाया , छत पर देखा , 
उतरण , मकरसक्रांति,
में मचा है, 
कटी  पतंग  का रेलम पेला। 

खुशीया  है , चारो ओर। 
पीहू , बैशाखी , पोंगल , लोहड़ी। 
उड़ा  के सारे गम। 
लगे है ,
बच्चो के संग ,
कटी पतंग के उधम में,
हम। 

उम्र का पारा , जोड़ो का  दर्द ,
झुकी कमर , धुंधली नजर ,
सबको उड़ाकर  , 
खो गये हम, 
नन्हे मुन्हे ,बच्चो के संग। 

झाड़ लिया और दौड़ पड़े ,
कटी जिंदगी, हारी  किस्मत ,
भूल के सब ,
दौड़ पड़े हम। 
लूटने चले , अपने जैसी,
किस्मत के हिचकोले खाते , 
कटी पतंग,
 रे भैया,
कटी पतंग  । 

पिकाचु 








कील , हथौड़ा ,

कील , हथौड़ा , 
सम्बन्ध है कैसा  
खटपट खटपट,
कैसे क्यों । 

निकल पड़ा है , 
कील जो  अपना ,
आंगन के दो कोने को ,
इस  डोर से मैं, बाँधु कैसे। 

मन का आंगन मैल से गीला ,
कौन से हथौड़ा, 
मारू मैं। 

संबंध जो अपना,
उधड़  पड़ा है , 
सुई से सिलाई न होये जो। 

कौन से हथौड़ा , 
आज जो मारू , 
रिश्तो की गांठ ,  न  उधड़े। 

मन तो मेरा ,
चाह है तेरा , 
फिर कील हथौड़े सा 
खटपट  क्यों। 

पिकाचु 

 




Sunday, January 8, 2017

वो नौनिहाल

बड़ा घर , कई कमरे ,
रहने वाला कोई नहीं।
कहानी है, ये  इंडिया की ,
अमीरजादों , ऐशजादों की।


सर्द , शीत , अंधड़ , बरसाती ,
दिन या रात, बीच सड़क के बीचोबीच,
बेघरों से  , रहते जो ,
दो बिजली के खम्बो के बीच ,
कहानी है , ये हमारे हिंदुस्तान की।


मर्म है , प्यार है ,त्याग है ,
जिन्दा रहने और जीने की,
जुनून है।
सर्द रातो को चीर के , बुलंदी की ,
परचम लहराने की आस है।
वर्तमान है  , ये हमारे हिंदुस्तान की।

यही वो नौनिहाल है ,
बैठा है जमी पे आज  ,
सड़क की मध्यम सी रौशनी में,
हाथो में  ले फटी किताब ।
भविष्य  है , ये हमारे हिंदुस्तान की।

गरीबी , बदहाली, कुपोषित ,
से लड़ता , असंख्य नामो से नेमित ,
छोटू , नन्हे , राजू , आमीर या हैदर है।
यह तो वह  अग्र, अधीर वीर है ,
जो  कल का कर्मवीर  है।

मंगल , शुक्र , चंद्र, तारो ,के बीच,
पहुँचने वाला अपना वही ,
सड़क के पाटो के बीच ,
बैठनेवाला  शूरवीर है।

पिकाचु





Saturday, January 7, 2017

संवेदनहीन हो चला

बुरे के साथ बुरा ,
भले के साथ भला ,
हिसाब - किताब करने ,
मैं ,चल पड़ा,
अब मैं ,चल पड़ा ।

मुरब्त नहीं ,
कर्म कर्तव्य में ,
इंसानियत का ज्ञान ,
मैं ,भूल चला ,
अब मैं  ,भूल चला।

निकल पड़ा,
अब मैं ,
बही खाता करने ,
संवेदनहीन हो,
मैं निकल पड़ा ,
अब, मैं निकल पड़ा।


क्या दीन , दुनिया,
अब ,
दिन हो या रात ,
जमी हो या आकाश ,
वक्त के साथ ,
मैं ,बदल चला,
अब मैं ,बदल चला।

प्यार या नफरत,
फसल कैसी भी हो ,
सबकी कटाई करने,
मैं  निकल पड़ा  ,
अब मैं निकल पड़ा।

गांठ बांध ली ,
अब मैंने।
न दया , न मोह ,
न क्रोध , न लालच ,
न सत्ता की अभिलाषा ,
न अपना न पराया।
सभी की आहुति दे ,
जैसे तो तैसा करने ,
मैं चल पड़ा,
अब मैं चल पड़ा।

पिकाचु

Thursday, January 5, 2017

हिसाब - किताब

क्यों तुमने  ,
यु ही मेरे संग ,
वादा वफ़ा का ,
बेफिक्री से,यु ही,
धुंए में  उड़ा दिया। 


खुश रहो, यु ही तुम ,
सोच में पड़े  , क्यों यु ही हम। 
ख़त्म किया , रहम दिया ,
बेवफा तूने ,यु ही हमको ,
ऐसा ,क्यों मरहम दिया। 

हर सुबह , खवाब के एक पन्ने में ,
जिक्र क्यों ,
यु ही तेरा हो जाता है। 
फिक्र का सैलाब , उमड़ घुमड़  ,
दिल को ,
क्यों यु ही,  
भूली यादो को उघेड़ ,
तेरी दीवानगी का   ,
फिर एक बार ,
यु ही ,
आशिक़ बना  जाता है । 

शिकन नहीं , कोई बात नहीं , 
वक्त की झुर्रियों की सौगात ,
खुदा से तुम्हे ,यु ही मिलेंगे। 

वक्त ही वक्त होगा , 
फिर यु ही,
हुस्न  की हिजाब का,
हिसाब - किताब , 
बख्त मेरी क्या ,
तेरा हमसंग हमसाया ,
वक्त लेगा। 

पिकाचु 


घर है ये क्या

घर है ये क्या ,
चूल्हा , बर्तन , बिस्तर , तकिया ,
चारदीवारी की चौहदी में ,
सीमित  अपना , 
ये रोजमर्रा का ,
कूड़ा करकट अपना। 
घर है , ये क्या। 


सफ़ेद , काला , सिंचित धन ,
साथ लेकर मटमैला सा,
सौंधा सा रंगविहीन पसीना 
लगाते , ईट , गारे , पत्थर में । 
फिर  बनता, ये  घर अपना सा। 


धूप , छांव , हवा , पानी ,
ऊंच - नीच , किस्मत की रवानी, 
आधार विश्वास जीवन की रवानगी 
सपने , हकीकत , कालचक्र से , 
बचने का आधार, क्या यही है ,
ये अपना सा घर। 

जीवन की पूंजी ,खर्चते ,
इसे व्यवस्थित करने। 
जच्चा ,बच्चा , 
मात पिता ,
पति-पत्नी,
कर्म कर्तव्य या जन्म मृत्यु,
रिश्ते, धर्म  की मर्यादा का ,
श्रृंगार  तो बनता, 
अपना सा ये घर। 

कितने घर , खड़े अकेले,
धरती की सम्पदा का दोहन कर,
सम्पति  की लोलुपता का आधार बन,
बाट जोहते ,खड़े अकेले।

ऐ मानव तुम ,
जागना है तो जाग उठो तुम ,
जाते वक्त सिर्फ तुम ही तुम ,
कोई खड़ा नहीं साथ, जो तेरे  ,
फिर क्या रखा है इट और गारे में।
बाँट तो जाओ ,
मटमैले से बच्चे की ,
खुशियो की आधार बनने,
अपना सा ये घर।

पिकाचु 




Wednesday, January 4, 2017

ऐ मेरी किस्मत

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एक बार तो मुस्करा दे ,
एक बार तो इतरा दे ,
एक बार तो थोड़ा उठा दे ,
ऐ मेरी किस्मत , एक बार  तो साथ दे।

कौन से चौराहे पर खड़ा हु।
एक बार तो रास्ता दिखा दे।
ऐ मेरी किस्मत ,
एक बार तो उस पीर से मिला दे।

एक  बार तो रंक से राजा बना दे ,
एक बार तो किसी हीर का राँझा बना दे ,
एक बार तो खुदा का मुखबीर   बना दे
ऐ मेरी किस्मत,
एक बार तो इस बुत में जान डाल दे।

एक बार नहीं अनेको बार देखा है ,
बस छू कर , फिसल कर जाते हुए।
एक बार तो ठहर जा मेरे साथ ,
एक बार तो दर्द बाँट जा।
ऐ मेरी किस्मत।
एक बार तो अपनी हिम्मत दिखा दे।


एक बार तो खुशियो की सौगात,
इस झोली में डाल दे ,
नहीं तो ,
एक बार, इस किस्मत को ,
ऐ खुदा ,
अपनी  कहर का इंतिहा  तो ,दिखा दे।

पिकाचु







Tuesday, January 3, 2017

खुदगर्ज ,खुदा ,खुदगर्जी बन

चौसर की बिसात बिछी है ,
पासा पास है , चलने को ,
कौन सी चाल, चल  चलु ,
कर्म , ज्ञानी , कुकर्म या अज्ञानी।

जनत या जलालत ,
कुफ्र या  आदमियत ,
फिक्र किसे ,
न मेरे लिए न तेरे लिए।

कौन यहाँ ठहरा है,
खुदगर्ज ,खुदा ,खुदगर्जी बन।
हर शख्स यहाँ प्यासा है ,
गर्म लहू पिने के लिए।

ताज तख़्त के चाह में,
मुकाबला किससे ,
मूक , बधिर , मौन ,
मर्महीन ,गौण, मष्तिष्क से।

चुरुट , चुरमुर ,अवपथ की राह में ,
किस अग्निपथ की गरज में ,
धूल उड़ाता , निकल पड़ा ,
इंसान अपना ,
बुदबुद सा मीर बनने।

पिकाचु




Sunday, January 1, 2017

सच और झूठ की ,
दो पाटो के बीच फँसी है,
दुनिया का तकरार और इकरार,
का सच ।

मर्द और औरत की ,
जिस्मानी प्यास की  आश में ,
बुझ  गई है जीवन,
और इसकी सर्जनशीलता।

देश विदेशज सा हो गया ,
मित्र भी शत्रु है आज।
बम गिराकर , नरसंघार कर,
अपकार , उपकार  भूल गए है, सब।

इंसान  का कोई मान  नहीं है,
इंसान क्यों ,  इतना खुदगर्ज है।
धूल में लोटे  , काले मटमैले ,
नवजात से भी , इतना इसको ,
बैर क्यों है।


टिश उठी है , बेकाबू दिल में ,
लब डब धड़कन , शोर में तब्दील ।
सिसकार उठा, हर मानव जब  ,
कितने चीत्कार ,
ऐ इंसान तू  , झेलेगा अब।


ह्रदय आघात भी बिसर गया है ,
आज का मानव क्यों इतना ,
भटक गया है।
दो पाटो के बीच ,
दुनिया क्यों इतना सिमट गया है।


पिकाचु