Sunday, October 16, 2016

फरिश्तो के आतिश में

फरिश्तो के आतिश में ,
गमो का रकबा छोटा होता।

दिलो के मिलने से ,
जोड़ियों का  सितारों से  मिलन होता।

बुलंद होती जो किस्मत इस अंजुमन का,
मुफलिसी में मुरादी की  महसूली ,
का इरादा न होता।

प्रलुब्धा सी ये सहचरी  की ख्वाहिश,
न की होती जो मैंने।
निशाचर हो  मैं,
यू गुनगुनाता न, मैं होता।

फ़ना हो,  मैं  वजूद ,
मिटाने को यू आतुर
सितमजदा क्यों होता।
सहारा जो तेरा,
ऐ बेवफा होता ,
यू मैं कलम का सिपाही बन ,
न यू  आवारा होता।



Saturday, October 15, 2016

 एक ही भगवान है पर हम अलग नाम
से बुलाते है। हम ऐसा मानते है। तो
हम क्यो मानते है। तो धरती अलग है।
ऐसा हम मानते है। क्या फिर हम क्यो
मानते है।की भगवान अलग है।




लिखा है। प्रखर नै

आज हम कुछ और होते

आज हम कुछ और होते,
तुम भी कुछ और  होते,
अगर हम साथ होते।

साथ हमारा - तुम्हारा जो होता,
प्यार का तरन्नुम भी होता ,
जिंदगी का फसाना भी होता ,
साथ जो हम होते,
आज हम कुछ और होते
तुम भी कुछ और  होते।

यू भीड़ में खड़ा मैं ,
बिलकुल अकेला न होता  ,
खुद से अनजाना,
यू दीवाना सा न होता ,
साथ जो हम होते,
आज हम कुछ और होते
तुम भी कुछ और  होते।

ये मुनासिब तो नहीं,
यू मुनसिब के दरबार में,
तकरार जो है ,
साथ बैठ अगर हम,
गम हलक  कर लेते ,
आज हम कुछ और होते,
तुम भी कुछ और  होते।


पहचान तलाशते  हम ,
जो फिर रहे है ,
शहर द शहर ,
अपना भी ,
एक घरौंदा  होता,
साथ जो हम होते,
आज हम कुछ और होते
तुम भी कुछ और  होते।

*************

अकेला : भीड़ में खड़ा मैं

भीड़ में खड़ा मैं ,
बिलकुल अकेला ,
खुद से अनजान ,
खो गया ,
खुद की तलाश में ,
बेसुध हू पड़ा ,
मैं खुद की तलाश में।

तलाश,  क्या अब तो एक लाश हू ,
रौशनी की पराबैगनी किरणों ने,
यू जलाया और यू  सताया कि ,
ज्योति की तरंगो से छिपते,
भीड़ में खड़ा मैं ,
बिलकुल अकेला।

काश भीड़ में तू मेरे साथ,
हाथो में हाथ , हमदम सा ,
मेरा साथ देती जो  ,
आज हम कुछ और होते
तुम भी कुछ और  होते। 

सपने देखने की आदत


सपने देखने की आदत थी ,
हर गली , चाक  चौबारे पे ,
निकलती कोई भी किसी चौराहे से ,
सपना बना लेते हम उसे,
इशारे - इशारो  से।

हिदायत थी हम सभी  परवानो को  ,
भूल से भी कोई न काटना,  हमारे रास्तो को ,
भाभी जो तेरी बन गई थी वो सपनो में  ,
निभाना तो था ही, हकीकत में हम सभी अपनों को।

फितरत हमारी कैसे ये हो गई ,
सपनो में कई को उड़ा के ले गई।


मौजो के  मस्ती में डूबे थे हम सभी ,
बस वक़्त  न ठहरा , बढ़ चला।

परवानो के लौ कब बुझने को आये ,
ये तो हम देख न पाए।

हम तो वही है  यारो , चाक चौबारे पे ,
बच्चे खेला रहे है  , मामा बन,
तेरी -मेरी भाभियो के।











कोशिश करना

व्यक्ति से समाज ,
गुरु से ज्ञान ,
व्यव्हार से सम्मान ,
कर्तव्य  है प्रधान ,
सार है इस कवि का।

कोशिश करना ,
सीखना , समझना, पहचानना ,
हारा हु , फिर भी  हारने की चाहत है ,
खुशियाँ बिखेरने की रवायात ,
आधार है, मेरी छोटी सी इस जिंदगी का।



बंदिगी है परवरदिगार की ,
विरक्ति है धर्म के वहम से ,
लोभ है इंसानियत का ,
झोभ है,  नासमझी का ।

इन्तेजार है मुझे
सिर्फ उस यम का।
साथ ले जाने को बैठा मैं
क्रोध , काम , ईष्या ,
द्वेष  मोह -माया को ।

चलो चले मैं , तुम,  हम और  सभी ,
रुखसत करने उस द्वार तक ।
क्या साथ दे पाओगे, आप सभी !.

Friday, October 14, 2016

रिश्ते टूटते है , बिखरती है जिन्दगी


दीवाने को  दर्द का साथ  ,
प्रेमी को प्रेमिका का साथ ,
जिंदगी में हमदर्द का साथ ,
हर गुजरते  लम्हे में ,
किसी न किसी का साथ, न हो  ,
तो , हम भी अधूरे तुम भी अधूरे।

कागज के फूल ,
बिन सुगन्ध के साथ
बिकते है यहाँ।

रिश्ते टूटते है , बिखरती है जिन्दगी ,
समझ है फिर भी नासमझ बन क्यों ,
मेरे सनम, अपने अहम में ,
हमें क्यों उलझाती है जिंदगी।

साथ न अब हो पाओगी ,
दूर जाती हुई लहरो की तरह ,
छु कर निकल जाओगी।
पता है , पर खता क्या है !
हाँ , जो अंश है तुम्हारा ,
उसे क्या बता के जाओगी।

वक़्त है संभल जाओ ,ऐ मेरी जिंदगी,
छदम अहम  को हवा कर , हम-तुम।
अँधेरे से रास्ते को  कुछ खुशनमा सा  ,
बनाते है , ऐ मेरी जिंदगी।





ये चाहत


दीवाने की दीवानगी ,
कवि की रुमानियत ,
आशिक़ की बेकरारी ,
सभी का एक ही करार है ,
ये  चाहत।

चाहता हू मैं तुम्हे ,
चाहती हो तुम मुझे ,
सोचता हु मैं ये जो ,
खुद को कोसता हू मैं।

गैरत क्या बिकी  महबूबा तेरी,
हक़ीक़त को दुःस्वपन बनाया ,
दिल को यू सताया , कि लहू सख्त हो गया,
बर्फ सा सर्द , रंग लाल से सफ़ेद,
भावना बिखर सी गई, दुर्भावना घर कर गई।

आज कल न चाहत है तेरी , सिर्फ बददुआ है मेरी,
न तेरे लिए न मेरे लिए , बस सितमगर ज़माने के लिए।
    

Tuesday, October 11, 2016

कवि की कल्पना

कवि की कल्पना में ,
कवि की कविता में ,
कवि की रचना में ,
कवि और उसकी स्त्रीलिंग  ही है।

लोहे की स्त्री जब गर्म होती है ,
कपडे तब नर्म हो जाते है ,
आड़े ,तिरछे , कपडे की रेखाए ,
सीधी हो जाती है।

कवि  की स्त्री गर्म हो तो ,
कवि की कल्पना,  कविता तथा रचना ,
को ग्रहण लग जाता है।

कवि ही ऐसा व्यक्ति है ,
जो वीर रस , हास्य रस , शौर्य रस ,
कि परिकल्पना से दुनिया इधर से उधर करता है।
यथार्त में कवि के पास न वीरता , न शौर्यता ,  न हास्य , है ?.
बस और बस उसकी बेचारगी है।

*****************



काठ का मानव

कौन ,कहा है,
सच किधर  छिपा है ,
खोज रहे है बेसब्री से ,
हर डाल पर बैठा ,
ये काठ का मानव।


राम कहा है ,
खोज रहे है ,
आज तो भाई दशहरा है।


रावण , कुंम्भकर्ण , मेघनाद,
कि आज  खैर नहीं है।
ये कैसा भ्रम है ,
क्या काठ का मानव जाग उठा है ?.


सोई  है मानवता ,
दूर खड़ा जो राम यहाँ ,
देख के ये सोच रहे है ,
नंगे , भूखे , अगड़ा ,पिछड़ा ,
शोषित , कुपोषित , किन्तु करे उदघोषित ,
क्या यही है  राम - राज्य ?.


रावण ज्ञानी था ,
मार  गया उसे कैसे,
ये कुठारघात।

बस किया ये अज्ञान ,
मर्यादा जो लांघी ,
नारी  सम्मान की ,
स्वर्णिम लंका धू - धू कर ,
कालिख के करुणा से ,
अभिशापित कर ,
लील गया झीरसागर ने।


आज तो हर डाल पर बैठा है ,
रक्षक के भेष में ये भक्षक।
नाम क्या बताऊ ,
संतरी , मंत्री , राजा हो या रंक ,
सभी को मारा , बेशर्मी ने  डंक।


रामजी देखकर ये चले  वनवास,
ऐसी मानवता को नहीं जरुरत है ,
मर्यादा पुरषोत्तम राम का साथ।


Monday, October 10, 2016

खुदगर्ज प्रिय


देखा जो मैंने ,
कैसे ये तूने ,
बेचे ये गैरत।

सौदा जो  किसीका  ,
तुझको निभाना ही था।

मदहोश क्यों कर गए  ,
जब दूर जाना ही  था।

धोखा  जो देना  था ,
अपनी ख़ुशी के लिए,
मेरे खुदगर्ज  प्रिय
बताना था  पहले ,
मुहल्ले से मैं सारे ,
दो चार यार, यूँ ही ले आता।

जनाजे को तुम्हे कांधा ,
देनी की न आती, ये  नौबत ,
शिकायत , फिर ये  तेरी, न होती ,
चाक , चौबारे , मुहल्ले से ।

जनाजा जो तेरे दर से ,
उठता ये  मेरा ,
आहे ये मेरी,
सदा बतलाती ,
कातिल तू है मेरी।

सदाये ये मेरी ,
पीछे है तेरी ,
छोड़ेंगी न यूँ  ही।

आके जरा तुम ,
जनाजे को छू जाओ ,
मेरी मोहब्बत को
सदा के लिए ,
अमर करके
तुम चली जाओ।








Sunday, October 9, 2016

games

खेल--खेल  के होगया बोर अब तुम ही
बताओ आज हम क्या खैले आज है।
दिमाग सोच -सोच के की क्या खेलेंगे
जो खेलतै रोज़ ये खेल कर देते है।
अब तो नया गेम बनाओ। 

Saturday, October 8, 2016

कौन है फूल

सुबह सवेरे मैंने देखे दो फूल ,
सोच मेरी कही खो गई ,
पूछा खुद से, कौन है फूल ,

रंग बिरंगी ,सतरंगी , फूल ,
ठेले पर सजी , पानी सी कुछ भींगी ,
अपनी सुंदरता से मन को मोहे ,
खुसबू  दूर तल्क जिसके बिखेरे ,
आकर्षित हो , सब देखे,
सजे थे ऐसे  फूल।

फूलो को गूँथ रही थी ,
रंग बिरंगी अकारो व मालो में,
वो महिला।
पास खड़े थे ठुमक -ठुमक  करते ,
नंगे बदन , नंगे पैर  ,
दो छोटे  से उसके बच्चे।

फूलो के भक्त, कोई पण्डित , कोई ज्ञानी  ,
सभी सम्भ्रांत , समझ से परिपूर्ण ,
मोल -भाव करने में  तल्लीन ,
लेते चले जाते सूंदर से निर्जीव फूल ,

मैं क्या बोलू समझ न पाया ,
कौन है असली फूल ,
नंगे बदन ये बच्चे या ये  निर्जीव फूल।

मानव की सोच को कैसे  हो गया, ये पक्षघात ,
क्या यही है , वर्तमान का मानव विकास।

रौशनी -अफसाना क्यों बनाया

रचना लग रही है अधूरी ,
सोच साथ नहीं दे रही पूरी।

मौसम में कौन सा ब्यार आया ,
हवा हो गई सारी रूमानियत मेरी।

रौशनी तेरी चकाचौन्ध,  दीवाने को यू इतना सता रही है ,
बंद आँखों से अँधेरे में  तरासने को दिल हो आया है।

सजदे तेरे दीदार को अरसा  हो गया,
पिघले नहीं तुम,
बहने के जगह सर्द बर्फ हो गए।

प्यार ही तो था मेरा ,
अफसाना क्यों बनाया ,
कोई अपनी जात का मिल गया
तो बेगाना बना दिया।


नाराजगी इतनी भी तो न करो कि ,
नाम देख कर  अनजाने हो जाते हो ,
बेखुदी इतनी भी तो न करो ,
चार कंधे मेरे जनाजे को न मिल पाये।

माना की , तुम हमारे दर पे आये  थे कभी,
हमने सर आँखों पे बिठाया था कभी ,
आज वक्त ने तेरी जिंदगी में खुशिया भर दी,
तो बेवफा बन किस बात की सजा दे दी।
 
कब से तेरे दर पर  रहमोकरम को पड़े है,
यू बेरुखी से तो रुखसत न करो अपने दीवाने को ,
कुछ तो रहम करो  इस दीवाने  को।


वक्त की करवटे में , कब से वीराने में पड़े है ,
समय चला गया है मेरा , क्यों ये दिखने को हो।

आबाद होने को आये थे , बर्बादियों के मंजर में ,
जा क्यों फँसाया , ऐ मोहब्बत
दुश्मनी समझू या दोस्ती ,
ये बात समझ में न आया।



मरे हुए को कितनी मौत मरोगे ,
बेखुदी इतनी भी तो न करो ,
इस दीवाने से , दो गज जमीन भी ,
न नसीब हो इस दीवाने को।

माना की ज़माने में हुस्न का ही जलवा होता है ,
परवाने की  आग में जलने की ही सजा होती है।
बता देते है ये , राख हो जायेंगे ,
फिर भी हवा के झोके से ,
मिन्नतें कर , तेरे दर पर ही गिरेंगे।

Friday, October 7, 2016

नाम ही बचा जो हमसाया सा साथ चला ,

नाम ही  बचा जो हमसाया सा साथ चला ,
मृत्यु को भी झुठला ,
अचल , अमर , अविचल, निश्छल,
सदियो से , सदियो के बाद
सिकंदर , पोरस , पृथिवीराज सा,
चल -चला,बस साथ ही चला।

हम - तुम प्रण ये करे ,
निष्कपट , निश्छल ,
कर्तव्य,  कर्मयोगी सा ,
ओत प्रोत  हो ओज  से,
हम तुम सृष्टि का
नव निर्माण करे।
कटुता , कायरता , भूख का प्रतिकार कर
समरसता का नव-संचार करे।




जीवन की है तीन पूंजी


जीवन की  है तीन पूंजी ,
बचपन , जवानी और बुढ़ापा।
समझ के भी जो न समझा ,
वो तो हम , तुम और सब  सारे है।

समझ में जब मेरे आया ,
दुनिया ने समझा  नासमझ।  कहा !

साथ न चलो हमारे, हमें मंजूर है,
रौशनी और साज न बनो , हमें मंजूर है ,
क्यों विचारो से क़त्ल करते हो हमें ,
जंजीर तो मत बनो हमारे ,
ये हमें नामंजूर है ।

अँधेरे में रौशनी ढूंढना ,
आवाज में साज ढूढना ,
ओ मेरे ,सूरदास , बधीरदास ,
वक्त का तकाजा  समझो ,
अँधेरे में तीर, कभी खुद को चीर जाती है।






Wednesday, October 5, 2016

गुमसुम , गमजदा, बच्चे ,

चंचल मन ,कोमल सा ह्रदय ,
अटखेलिया , ठिठोलिया , नटखनापन
तभी तो होते है ये बच्चे ,

रोज सवेरे जाते ये बच्चे ,
बढ़ने और पढ़ने को स्कूल।

देखा जो मैंने आज इनको,
शांत थे सारे ,नहीं थी कोई आवाज
सोचा जो मैंने , ऐसा क्या हुआ ,
कैसे हो गए ये रातोरात, ये बड़े बच्चे।

सोचा जो मैंने ,क्या हुआ ऐसा ,
पूछा जो मैंने अपनेआप से ,
गुमसुम , गमजदा, बच्चे ,
युद्ध या स्कूल , कौन से ओर
ले चले हम इन माटी के कच्चे ,
दिल के सच्चे बच्चो को।

सोचा खुदा के बंदिगी के साथ ,
चले तो हम भी थे एक दिन ,
डगर में इतनी मोड़े थी ,
रास्ता जो भूले हम ,
फसल जो बोई है बैर की,
इम्तिहान है ये शर्मिंदिगी की।


फिर क्यों बनाये इन बच्चो को ,
गुमसुम , गमजदा, बच्चे।

Sunday, October 2, 2016

समझ नहीं आरहा भी अब तुम ही बताओ मेरे 
भाई सुज अब  दिमाग नहीं आरहा।  कूछ तुमा 
रे रास्ते मुजे भी बताओ ऐसे छुपाओ।
 मत
अब बताओ क्यो मुजसे मेतूम से बड़ा 
हूँ। तुमे मरी बात मानो तो मे तुमारी 
भी मनुआंग 
हो गया परेशान अब जीने दो खुल्के दिमाग मै 
ना आता है। कुछ नहीँ आता अब तुम ही बताओ
मेरी बहन भामनी तुमारे पास तो बोहोत आइडिया
होते है। उनमे से एक मुजे देदो फीर मे नहीं होएंगा
परेशान  









खत्म हुई कहानी की छाया सुरु हुई सूरज चाचू की माया जब रात हो                 प्रखर    
जाती है। तो सूरज चाचू गायब हो जाते सूरज चाचू के गायब होने
से चंदा मामा आते है। जब चंदा मामा आते है। तो बोहोत चमकते है।
दिन होने पर चंदा मामा गायब हो जाते फिर सूरज चाचू आजाते
है।