Thursday, September 22, 2016

ज्योति


  • ज्योति


ज्योति के आने से  अँधियारा छंटता  है।
ज्योति के जाने से दिल फटता है।
पर ज्योति को क्या फर्क पड़ता है ,
वो तो ज्योति की गति से मेरे आँखों से ओझिल हो गई ,
और हम अभी भी ह्रदय के धमनियों में , हृदयाघात से बचने के लिए ,
 ज्योति के तरंगो के  आस में जी रहे है।

ज्योति आप महान हो , आपने अपने   दिल के दुकान में ,
कई ज्योति छुप्पा रखा है , जो रंग बदलती वक़्त के साथ ,
मृग तृष्णा की तरह , रेत की टीलो में हरियाली बिखेरने की जगह ,
अपनी ज्योति जला  , अपना ही रंग बिखेरते  ,
किट पतंगों को जलाते हुए , अपनी ही गति से  गतिमान है।

ज्योति को अपनी गति  का अभिमान है , अपने पे ही गुमान है ,
तुम कौन हो , तुम्हारा दर्द क्या है , तुम्हारा अस्तित्व क्या  ,
ज्योति इन सब से बेखबर, सैर करती है इस आकाशगंगा में ,
असंख्य टिमटिमाते हुए  टूटते तारे , ज्योति की तरफ देखते है ,

ज्योति न तो रुदाली है , न ही तेरे साथ  की हम ख्याली है ,
ज्योति तो सिर्फ अपना वक़्त देखती है और गतीमान हो ,
अपना स्वार्थ साधते हुए , बहती हुई आँखों को चोंधियाते हुए
अपनी ही ज्योति जलाते ओझिल हो जाती  है ।

ज्योति की  रंग बदलती सतरंगी  इंद्रधनुष चालो को
ये किट, पतंग शत -शत नमन करते है ।



Wednesday, September 21, 2016

भाई ऐसा कब तक चलेगा

भाई ऐसा कब तक चलेगा , बॉस ने बोला ,
जब तक चल सकता है तब तक चलेगा , मैंने बोला।

भाई ऐसा नहीं  चलेगा , बॉस ने बोला ,
ठीक है जैसा चल रहा है चलेगा , मैंने बोला।

बॉस को खीज आया , ऐसा लगा जोरो से जुकाम का झिक आया ,
गला खड़खड़ाया और जोर से चिल्लाया , भैया ऐसा कब तक चलेगा।

दिला दो , करा दो , मैंने बोला , मानवता के नाते ,
मेरे बॉस,  चिल्लाने के अलावा और भी कुछ करा दो।

बॉस को और जोर से गुस्सा आया , क्या समझा है ,
तुझे दरवाजा दिखाता हूँ , नहीं तो नागालैंड भेजता हूँ ।

मैंने बोला बॉस जाने के लिए तो मैं भारत में कही भी चला जाऊ,
पर मेरा  कुछ  तो करवा दो ,नहीं तो मुझे लॉक  अप  में ही  बंद करवा दो।
बहुत हो गया ये चिक -चिक। , बहुत हो गया ये चिक -चिक।

क्या करवा दो , दिला  दो लगा रखा है ,
भाई माजरा क्या है , कुछ तो बता दो।

मेरे बॉस दुनिया में अकेला हूँ , साथ में कवि हो रखे ला हूँ,
इसके ऊपर से  निम् चढे करेला है की , प्यार करने की शोहबत पाल रखेला  हूँ।
जिसे हमने  आज तोहमत   बना रखेला  है।

मेरे बॉस,  न मुझे  इक़बाल या  गालीब  या इंकलाब   बनना  था ,
मुझे तो बस एक इंसान के साथ इंसान  बनना  था।
कुछ  न दिलाओ ,  बस ये दरियादिली दिखाओ,
की तुम भी हमारे साथ आओ , और साथ जी के दिखाओ।
और फिर बोलकर दिखाओ की भाई ऐसा कब तक चलेगा !!!!!!!!!





Tuesday, September 20, 2016

हमने भी गालीब , इक़बाल बनने की कोशिश की

हमने भी गालीब  , इक़बाल  बनने की कोशिश की ,
इनके पदचिन्हो पर कभी चलने की कोशिश  की।

कमबख्त हाथ में बोतल था ,और  बस उसका सोच था ,
निकल पड़े उनके ख्याल खमाली में।

सोचा न होश कहा था , मदहोश से तीन प्याली में ,
सामने से कुकूर आ रहा था , सोचा किधर जाऊँ ,
बाये जाऊँ की दाये जाऊँ , इसी उहापोह में था ,
कुकूर ने भी भांप लिया , वह  बाये गया न दाये
बस    आक्रोशित हो सीधे ही  आक्रमण किया।

कही रैबीज न हो जाये , अब तो सिर्फ कूकर का ही ख्याल था ,
क्या करे न करे  इसी डर से  हम बेहोश हो चले।

मेरे दोस्त कभी भी अपनी  गम ख्याली न करना ,
तोहमत  कुफ्र के तुम ही भुक्त भोगी  होंगे।

ग़ालिब या इक़बाल  का क्या होगा , ये तो अपना  मुकाम
लिख कर  चमन  के  फ़ाज़िल आफ़ताबी है।
हम तो बस इनकी शोबहत के दीदार के काहिल है।  

Sunday, September 18, 2016

पूंजीवाद की माया

न कमाया तो क्या माया , न गवांया तो क्या  माया ,
न सोया तो क्या खोया , न पाया तो क्यों रोया।
न देखा तो क्यों पछताया , अब पछताया तो क्या पाया ,
न पढ़ा तो क्या पाया , न पढ़ाया तो क्या पाया।

न वंशवाद में क्या पाया , न प्रजावाद में क्या पाया ,
न मूल्यों के ह्राष में क्या पाया , न टूटते हुए रिस्तो में क्या पाया।

न में मेरी आपने मेरी नाकारात्मता  पाया , ये  सोचा आपने।
न देखा आपने इस दौड़ में , न कितनो को खो दिया आपने।

न लहू का रंग लाल रहा, न तो कोई ऐसा माइ का लाल रहा
न की खेल में, न पुराने ही रहे, न नए हो पाए ,
न प्रजातंत्र हो पाया, न समाजवाद  हो पाया।
 
हाँ हम खो गए इस पूंजीवाद की  माया में जिसने
व्यक्ति , समाज , देश , दुनिया को ऐसा भरमाया है ,
न राम रहे , न रहीम रहे , न गुरुनानक रहे , न क्राइस्ट रहे ,
बस डोनाल्ड , मैकडोनाल्ड , ट्रम्प और बस व्यापार रहे।


Saturday, September 17, 2016

एक कौआ, एक कबूतर , एक तोता

एक कौआ, एक कबूतर , एक तोता
तीनो ने मिलकर सोचा, क्या सोचा,
इंसान को खाने का सोचा ,

दाने दाने  को है मोहताज ,

कभी बाढ , कभी सूखा कभी इंसानो का बम ब्लास्ट ,

इन सब ने धरती की धार बदल दी,
गुरुत्वाकर्षण की चाल बदल दी ,

सागर , नदिया , धर्म , इंसान ,
ईमान ,हो गई है सदियो की सोच  ,
 हम तो ,''हम तो ,  तीन चिड़या ,
दाने दाने को खाने को है मोहताज।

बच्चा  बैठा देखो रूठा , पर क्या यह भी है सच्चा ,

मानवता की दानवता की छदम चाल में  ,
क्या बच्चा क्या जच्चा क्या  कौआ क्या तोता ,

सब खोकर केवल मैं का  स्वार्थ ले दौड़ पड़े है।

देखे क्या होता है , देखे क्या होता है , बस सोच रहे है । । । । । । । । । ।


Thursday, September 15, 2016

प्यास


प्यास

नवजात को है माँ की दूध की प्यास
बच्चे  को है अपनापन और प्यार का आस
किशोर और किशोरियो को शरीर की आग का है एहसास ,
युवावस्था में है है बुलंदियों की छुने  की प्यास।

हर उम्र में है प्यास और एहसास ,
बदलती हुई तस्वीरो में दिखती है
लकीरो की बढ़ने और घटने की तराश।

काश एहसास की ये आस समय के समझ के  साथ  होती हमारे साथ,

न होती ये नदियों का लहू से  लाल होकर  बहने की एहसाश।
काश एहसास की होती प्यास नर और  आदम  में ,
तो जिन्दा रहती जीने की प्यास।
एहसास की बदलती तासीवरो में बस और बस,
अपना स्वार्थ साधने  की है प्यास।
मंदिरो मस्जीदो गुरुद्वारों एवं चर्च में बंट गया है मानव का एहसास।






Wednesday, September 14, 2016

विकास की यात्रा

विकास की यात्रा पर हम क्या चले ,
अपने ही अपने रास्ते रास्ते से दूर हो चले।

क्या आदिवासी , क्या दलित , क्या सामान्य ,
सब खुद में ही अपनी खोखली चोंचले में जी चले।

वक्त आया जब , लड़ने लगे , काटने लगे ,
क्या यही सोच ले चले हम, आने वाले सदियो में।

पता नहीं पर पता है विकास की सह- मात की यात्रा में  ,
मित्रो ,  मेरे भाइयो , मेरे देश वासियो  सब कुछ  खो चले हम।

 विकास की यात्रा पर हम क्या चले ,
अपने ही अपने रास्ते रास्ते से दूर हो चले।

सोच नई तू लाना अपना इन्सा हो बस इंनसा जैसा

लोग कायर लोग काहिल फिर भी जी रहे है बदहाली में। 
अपनी सोच अपनी ढपली अपनी आगाज के खयाली में,
मदहोस हो नाच रहे है भौतिकवाद के खुमाली में। 

पास खड़ा कौन है , भूखा , नंगा , क्या यही है इंसान , 
ये सोच रहे है या न सोच रहे है पर सरपट दौड़ लगा रहे है। 

भूख़ बढ़ी  मांस की  प्यास बढ़ी  शराब की , 
नोच रहे है खसोट रहे इंन्सा की इंसानियत। 

क्या पाया क्या खोया बैठा जब मैं ऐ इंनसा पास न था कोई ,
दूर खड़े थे सब अपने सब,  बस पास खड़े थे तन्हाई मेरी ,

ऐ दोस्त क्या किया हमने अपना तुम न करना ऐसा अपना ,
सोच नई तू लाना अपना इन्सा हो बस इंनसा जैसा। 

Thursday, June 2, 2016

हवाई यात्रा: कहानी एक साइलेंट एयरपोर्ट की

                                             हवाई यात्रा: कहानी एक  साइलेंट एयरपोर्ट की 

जीवन एक निरन्तर  यात्रा का नाम है  जो गतिमान  है और जो निरूत्तर होता है हमारी  अंतिम  यात्रा में ।   

जीवन की इस निरंतरता को बनाए रखने के लिए हम यात्रा करते और उन्ही यात्राओं  में से हाल फिलाल में  घटी हुई एक हवाई यात्रा की घटना का जिक्र करता हूं।  

मैं यात्री नहीं था अपितु यात्रा करने वाले को अगवानी करने हेतु हवाई अड्डे गया था।  मेरे माता -पिता लखनऊ से कम लागत वाली विमान सेवा से  डेल्ही आ रहे थे यानि की टर्मिनल १ डी।  
रात का समय था , समय  १० बजे का आगमन का था।  मैंने दोस्त से  उसकी मोटर कार ली और पहुंच गया टर्मिन १ डी रात के ९.३० बजे और लगा दी गाड़ी पार्किंग में जिसका चार्ज था ९० रुपये घंटा।  कोई बात नहीं एक घंटे का ही भुगतान करना है ऐसा सोच कर गाड़ी लगा दी मैंने।  
  डिस्प्ले बोर्ड पर आगमन के समय का सही वक़्त  दिखा रहा था सो मैं संतुष्ट हो इंतजार करने लगा , तभी कहानी में थोड़ा मोड़ आया अचानक ही  मौषम बिगड़ गया।  तेज हवा और बरसात के साथ बादल  गरजने और बिजली चमकने लगी।  थोड़ी देर में डिस्प्ले बोर्ड पर लिख कर  आने लगा की  प्लेन डाइवर्टएड।  मैंने यह सोचा की चलो  , थोड़ी देर में  यथा- स्थिति से अवगत कराया जायेगा। 

ऐसा कुछ नहीं घटा ।  हवाए तो चली गए  , पानी तो बरस गई , बादल  तो गरज गए  किन्तु  डिस्प्ले बोर्ड पर लिखा डाइवर्टएड का सन्देश यथावत रहा।  मैं असमंजस में था क्या करू क्या न करू।  सोचा कोई उद्घोसना होगा पर पता चला की डेल्ही एयरपोर्ट तो मौन एयरपोर्ट है , मुझे आज पता चला की मौनी बाबा से सरोकार बहुत महंगा होता है।  

मैंने सुरक्षा कर्मी से निवेदन किया की वस्तु  स्थिति का कैसे पता चलेगा,  तो उसने दया खाते हुए एक टेलीफोन नंबर दिया।  मैंने  जब उस नंबर पर फ़ोन किया तो किसी  सख्स ने फ़ोन उठाते ही सबसे पहले पूछा की नंबर किसने दिया  है।  मैंने बोल सिक्योरिटी से नंबर लिया है और यह बताया गया है की एयरलाइन्स के ऑफिस का है।  इतना बोलते ही उस सख्स ने फ़ोन रख दिया।  
कोई चारा न देख मैंने  मोबाइल  पर इंटरनेट कर एयरलाइन्स के कॉल सेंटर पर फ़ोन लगाया।  स्वचालित उत्तर पर कॉल सेंटर का प्रणाली था और जब भी मैं ग्राहक सेवा प्रतिनिधि से  बात करने का बटन दबाता  तो काल वियोजित  हो जाता।  ऐसा कई बार हुआ , थक हार  कर मैंने फ़ोन करना ही बंद कर दिया।  क्या रात के दस बजे ग्राहक नहीं होते ? क्या ग्राहक सेवा नाम का है ? मैंने सोचा विमान कंपनी को जवाब देना चाहिए ?? 
अब एक ही रास्ता दिखा की टिकट काउंटर पर जा कर पूछू ।  टिकट काउंटर कहा था  , भाई  उपर  , यानि की आगमन कच्छ पर।  मैं सीढ़िया चढ़ कर आगमन कच्छ पंहुचा , क्योकि अब मुझे इस एयरपोर्ट के प्रणाली से विश्वास उठ रहा था और मन के एक कोने  यह भी  डर समा गया था  लिफ्ट बंद हो गया तो , मैं तो गया।  

भारी  कदमो से मैं  टिकट काउंटर पर बैठे हुए सख्स से पूछा , उसने ऊंघते हुए कुछ बोला।  मैंने जोर से बोला भाई साहब लखनऊ की फ्लाइट डाइवर्ट हो कँहा  गई है।  जवाब आया निचे डिस्प्ले हो रहा होगा , मैंने कहा नहीं। तो जवाब आया की फ्लाइट डाइवर्ट हो कर जयपुर लैंड कर गया है।  धन्यवाद।  अगला जवाब।  यह काम एयरपोर्ट रखरखाव करने वाली कंपनी का है।  हमारा नहीं।  मैंने कहा पर विमान  चलाने वाली कंपनी तो आपकी है न।  निचे कई लोग जानकारी के आभाव में खड़े है , क्या यह आपका कर्तव्य नहीं की आप उनको जानकारी दे।  मैंने हँसते हुए कहा भाई आप युवा है , आपको तो पहल करना चाहिए।  मेरा देश बदल रहा है , आप भी तो बदलो।  कोई जवाब न आया।  

तभी मेरे फ़ोन की घंटी घनघनाए , और पिता ने बताया की फ्लाइट जयपुर से मौसम ठीक होने के बाद चलेगा , जो की १ बजे रात के आसपास है।  मैंने एयरपोर्ट पर  ही इंतजार करने का सोचा और बैठ गया। एक कोने में कुर्सी पर  बैठे - बैठे कब  नींद आ गई पता नहीं चला और  जब  नींद खुली तो पता चला की फ्लाइट डेल्ही लैंड करने वाली है।  

मोबाइल के तरफ देखा तो ४ बजने वाले थे. इतनी सुबह उठ तो गया पर प्यास लग गई थी , सो पानी  का बोतल खरीद  कर पानी  पिया। 
सबेरे सबेरे पानी पिया था तो प्रेशर आना लाजिमी  था।  पेट पकड़ में शौचालय के तरफ दौड़ पड़ा।  वहाँ जाकर एक अजीब से स्थिति देखा की सारे शौचालय अंग्रेजी शैली के है और सारे  के सारे के नल टूटे हुए है। 

क्या आप  सोच सकते है  स्थिति में आपको कितना गुस्सा और पीड़ा होता होगा।  मैंने सारे घटना को नजर अंदाज कर दिया था , पर जब ये हो गया तो मुझे लगा पानी और प्लेन दोनों सर के उपर से गुजर गया है और अब आप लोगो को यह  बताना जरुरी है सो मैंने लैपटॉप उठाया और लिखने लगा। 

क्या हम देश में कभी  ऐसे स्थिति बनायँगे और पाएंगे की इन छोटी छोटी जरूरतों का हम सभी लोग ध्यान रखेंगे।  क्या साइलेंट एयरपोर्ट बना कर पुरस्कार लेना ही हमारा कर्म और धर्म है।   क्या एक ऐसी व्यवस्था जो परस्पर  संवादात्मक न हो की जरुरत है।  क्या ५४० रुपये पार्किंग का देना जायज है ?

  • जवाब आपको देना है और  मैं इंतजार में बैठा हू......... 


Tuesday, May 24, 2016

मेडिकल चेकअप

मेडिकल चेकअप 
वक्त की कमी आजकल हर कोई को रहती है पर हमारा अनुरोध है जरा समय निकाल  कर पढ़े सोचे और भूल जाये।  

यह किसी की व्यक्तिगत घटना नहीं है , यह हर किसी के जीवन में घटता है।  मेरे जीवन में भी घटा है। 

क्या कहु पेट में दर्द हो रहा था  कई दिनों से , मैं  जयपुर में था बच्चे के साथ अकेला , वक्त नहीं मिला की दर्द भी हो रहा है , सोचने का।  सोचा कब मैंने जब मेरे एक मित्र का लिवर ट्रांसप्लांट होने का सुना।  मुझे भी लगा कही मेरा लिवर तो नहीं गया।  ऐसा लगता था की लिवर कभी ऊपर हो रहा है कभी निचे।  कभी दर्द किडनी में होता तो कभी अपेंडिक्स जैसा होता।  सोच सोच के परेशान हो रहा था।  बच्चा भी मेरे साथ था , गुस्से में मैं उसे भी डाँट दे रहा था , वो भी पिलपिला उठता था गुस्से से  , छोटा है अभी कुछ संस्कार बचे  है , इसलिए आँखे लाल कर शांत हो जाता है ।  इसी उहा पोह  में मैंने सोचा चलो डेल्ही चलता हु ,वंही चेकअप करा लूंगा. 

ट्रेन पकड़ी और पहुंच गए देल्ही के सबसे अच्छे  हॉस्पिटल में चेक कराने।  बच्चे को दोस्त के घर छोड़ा  और चला चेकअप कराने। जीवन  में पहली बार ऐसे बड़े हॉस्पिटल में आया था , तो ऐसा लगा की मै , किसी बड़े पांच सितारा होटल में पहुंच गया हुँ , देखा तो निचे में बड़े बड़े फ़ूड आउटलेट है , मोबाइल की शॉप है और ऊपर में हॉस्पिटल।  

हॉस्पिटल में व्यक्ति  के  जरुरत की  हर सुविधा है.  जी हाँ  इलाज भी बहुत अच्छा है , ऐसा सभी लोग बोलते है , पर मैंने देखा की लिपस्टिक लगाए हुए  अटेंडेंट हर काउंटर पर उपलब्ध थी, हमारी सहायता को।  सेवा और सहायता में वो पीछे नहीं थी परन्तु जब वो हमें डॉक्टर के पास ले जाते तो , डॉक्टर उनसे बड़े मुस्करा के बात करते और हमें देखते ही सोचनीय मुद्रा में आ जाते।  मैंने सोचा चलो काला हूँ  तो ऐसा होगा :  पर नहीं , अन्य पेशेंट्स के साथ भी डॉक्टर्स ऐसे ही थे.  मन को थोड़ी शान्ति मिली। 

 बीस तरह के टेस्ट कराने  थे तो पूरा दिन निचे ऊपर करते ही गुजर गया।  ऐसा लग रहा था की किसी कारखाने के लाइन प्रोसेस सिस्टम में हमारी एंट्री  हो गई है और हम एक मशीन से दूसरे  मशीन पे गुजरते हुए जा रहे  है। 

मुझे यह सोचने पे मजबूर होना पड़ा की आज की मेडिकल सिस्टम में दो ही चीज  काम देता है , वो है पैसा और दूसरा है बड़ी बड़ी कम्प्यूटर्स और मशीने।  ऐसे में डॉक्टर्स और कम्पौंडर्स  मशीन के तरह हो जा रहे है।  संवेदनहीन।  संवेदनहीन।  संवेदनहीन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, . 

क्या सही है या गलत मैं आप पर छोड़ता हू। 
आप सोचे जरूर क्योकि देश में अभी भी एक बहुत बड़ा वर्ग है जो इन सुविधाओं से अलग थलग है।  क्या यह सोच रख कर क्या हम इस वर्ग की सेवा कर पाएंगे। 












Sunday, May 22, 2016

www.complaintcare.com

Awake your self for your rightful grievances

Saturday, March 19, 2016

Complaint Care.Com: Ask Complaint Champ for your Gruevance

Complaint Care.Com
Complaint Care. Com is an initiative of three elderly people who have provided a platform to the consumers /common man of the country, for raising their complaints/grievances against the financial institution and government authorities.
Whether it is a loan related complaints, or problems encountered in day to day  life such as water bills, electricity bills, parking problems, or the operation of pseudo companies raising money/deposits by fooling the common man / consumers. We at Complaint Care.Com endeavour to overcome your grievances.
Complaint Care.Com and its mobile application helps you to forward your complaint directly to the institution and government organisation either by filling the complaint form available on the website /mobile application or you can also can send your complaint directly to the government offices as per the email/address provided in the website.
It is widely seen nowadays that the common people/consumer gets cheated by the unfair practices of the institutions/ company. This website and its mobile applications is a glimmer of hope because the complaint at the right time and the right place for such unfair practices can resolve our grievances and also can save all of us from future frauds.
The website and mobile applications also envisages many relevant Acts / Rules Regulation for information and our ready reference.
We are also continuously expanding our data base.
It is a matter of pride and inspiration for all of us that through this website and mobile applications; we all can play our role in strengthening of corporate governance in our country.
We solicits your participation and feed back in your initiative “ Complaint Care.Com”

"Complaint Care Team"

कंप्लेंट केयर

कंप्लेंट  केयर कॉम हम तीन बुजुर्गो द्वारा किया गया एक  प्रयास है जिसके माध्यम से हमने  देश की जनता को एक मंच प्रदान किया है।  कंप्लेंट  केयर कॉम के माध्यम से आप अपनी समस्यायो के लिए विभिन्न सरकारी विभागों से संपर्क कर सकते है और कैसे इसका निवारण हो, यह भी  जान सकते है।

चाहे लोन /ऋण सम्बन्धी शिकायत हो , कंपनी द्वारा जनता को गलत जानकारी देकर गलत बिज़नेस करने की शिकायत हो , दैनिक जीवन में आने वाली समस्याएं हो जैसे बिजली का बिल पानी का बिल , पार्किंग आदि की समस्या हो; कंप्लेंट  केयर से आप इनके समाधान के लिए कोशिश कर  सकते है।   

अगर आपको जानना है की ऐसे मामलो की शिकायत कहा करनी है ; तो यह जानकारी सटीक रूप से आपको इस वेबसाइट तथा  इसके मोबाइल एप्लीकेशन पर मिलेगी।  आप चाहे तो इस वेबसाइट पर कंप्लेंट फॉर्म भर कर सीधे सरकारी कार्यालय भेज सकते है या सरकारी कार्यालय का पता प्राप्त कर अपने ईमेल / पते से भी शिकायत कर सकते है।

आज कल कुछ गलत कंपनी द्वारा आम लोगो को धोखा  देकर पैसा हड़पने के मामले प्रकाश में आ रहे है और कई मामलो में तो आम लोगो की पूरी जिंदगी की जमा पूंजी ही डूब जाती  है।  ऐसे में यह वेबसाइट तथा  इसके मोबाइल एप्लीकेशन एक आशा की किरण है क्योकि सही जगह और सही समय पर की गई शिकायत से इस प्रकार के धोखाधड़ी  से बचा जा सकता है।

 इस वेबसाइट तथा   मोबाइल एप्लीकेशन पर पर कई प्रकार के अधिनियम / रूल रेगुलेशन भी उपलब्ध है जिनसे आम आदमी अपना ज्ञान भी बढ़ा सकता है और नियमो की जानकारी लेकर अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद कर सकता है। हम अपने डेटा बेस को लगातार बढ़ा भी रहे है। 

यह हम सबके लिए एक प्रेरणा का विषय है की इस वेबसाइट तथा  मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से एक आम उपभोक्ता 
देश में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को मजबूत करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।  
 
हमारी इस सार्थक पहल में आपकी सहभागिता और प्रतिक्रिया / फीड बैक की  हमें प्रतीक्षा रहेगी।

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यह भी एक प्रेरणा का विषय है की इस वेबसाइट तथा  मोबाइल एप्लीकेशन को देश की जनता के लिए बनाने का जिम्मा हम जैसे ऐसे बुजर्गो ने उठाया है जो आज भी यह मसहूस करते है की देश में अच्छी कॉर्पोरेट गवर्नेंस / सिस्टम  के लिए  हम सब को आगे आना जरुरी है।

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आज कल कुछ गलत कंपनी द्वारा आम लोगो को धोखा  देकर पैसा हड़पने के मामले प्रकाश में आ रहे है और कई मामलो में तो आम लोगो की पूरी जिंदगी की जमा पूंजी ही डूब गयी है।  ऐसे में यह वेबसाइट तथा  इसके मोबाइल एप्लीकेशन आशा की किरण है क्योकि सही जगह और सही समय पर की गई शिकायत से इस प्रकार के धोखाधड़ी  से बचा जा सकता है।

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Friday, March 18, 2016

कंपनी किसी भी तरह की हो हमने यह कोशिश की है की आप इनकी शिकायत कर सकते है।

कंप्लेंट केयर. कॉम एक ऐसा शिकायत निवारण का पोर्टल है जिसके तहत आप किसी भी कंपनी का कंप्लेंट उसके रेगुलेटर को सीधे भेज सकते है।

भारत विश्व का एक बहुत बड़ा बाजार है जिसमे लगभग १२५ करोड़ की जनसंख्या की जरुरतो का विभिन कंपनिया अपनी सेवा प्रदान करते है।  इस बाजार को नियंत्रित करने के लिए कई नियामक आयोग बनाये गए जो इनके उपभोक्ता को सही सेवा प्रदान करने हेतु निरन्तर प्रयासरत रहते है. अपितु यह एक बहुत ही कठिन कार्य है किन्तु कई बार ऐसी कंपनिया भी आ जाती है जो सही सेवा नहीं प्रदान करती है.

ऐसी  सभी कम्पनियो  के शिकायत आप हमारे वेब पोर्टल से कर सकते है

कंपनी किसी भी तरह की हो हमने यह कोशिश की है की आप इनकी शिकायत कर सकते है।  आप अगर इनके रेगुलेटर को नहीं जानते है या आपको पता नहीं है की यह  रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज से रजिस्टर्ड है या नहीं तब भी हमारा पोर्टल का उपयोग कर आप अपना शिकयत को उस राज्य के रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज के ऑफिस या  उस राज्य में सिथित उस कंपनी के विनयामक आयोग को पहुंचा सकते है।

आप हमारी इस सेवा तथा पहल का उपयोग करे।  






Saturday, March 12, 2016

कंप्लेंट केयर

हमारा देश भारत बहुत  ही विशाल है।    इसकी विशालता का अनुमान इसीसे से लगाया जा सकता है की अनेकता में एकता इसका मूलभूत स्वरुप है।  
आपको पता है इस विविधता वाले देश में कितने तरह की व्यायवशीक गतिविधिया  होती है। आप कहेंगे की हाँ इसकी जानकारी है हमें , किन्तु ऐसा महानगरो में रहकर ही कहा जा सकता है।  सुदूर प्रदेश में इनकी गतिविधि पर पैनी नजर रखने के लिए कई विनमायक आयोग  है  परन्तु  कई संस्था ऐसी है जो हमें गलत जानकारी के साथ सही सेवा नहीं  देते है।  हमारी जागरूक पहल के बिना हम पूरी तरह से इनके ऊपर पूरी तरह से नियंत्रण नहीं रखा जा सकता है   

कंप्लेंट केयर डॉट कॉम में हम कोशिस करते है की हम आप लोगो को सही जानकारी पहुचाये।  आप ही हमारे साथ जुड सकते है।  

धन्यवाद 
टीम कंप्लेंट केयर 

a new initiative

मेरा आप सभी से अनुरोध है कि किसी भी कंपनी के विरूद्ध शिकयत फाइल करने के लिए complaintcare.com वेबसाइट पर लोगिन करें और अपनी शिकायत सही जगह पर समाधान हेतु पहुंचाए। 

Friday, March 11, 2016

SNOW WHITE

एक बार एक रानी और राजा थे। एक बार रानी महल की  खिरकी  से बाहर देख रही थी। उसने बर्फ पर तीन बूँद खून के देखे।   तभी उसने चाहा की उसकी बच्ची बर्फ की तरह सफ़ेद हो ,उसके हॉट खून की तरह लाल हो और उसके बाल एक काले घोड़े की तरह काले हो। और जैसा उसने चाहा वैसे ही हुआ। वे सब बहुत खुश थे। उसका नाम स्नो वाइट पड़ा।




                                          THE            END
मेरा नाम भामणी  है।  आज मै आपको कम्प्लेंट केयर कॉम के बारे में बताउंगी. 
मैं क्लास ५ में पढ़ती हू। कोम्पलिएंट केयर में कम्पलेंट करने से वो हमारी मददद करता है। 
हमें इसका सही इस्तेमाल करना चाहिए। हमें ये भी कोशिश करनी चाहिए की हम इसका सिर्फ मद्दद के वक्त ही इस्तेमाल करना चाहिए। हमें इसका गलत इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए। इसके गलत इस्तेमाल से हमें खतरा हो सकता है। हम जो लिखते है उसका सही मतलब भी होना चाहिए।